भारतीय शिक्षा मन्दिर

इण्टर कालेज

विद्यालय के बारे में

विध प्रसिद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से अग्रणी अनादिकाल से ज्ञान, शिक्षा एवं साधना की केन्दस्थली काशी के हृदय स्थल पर हृदय हार के रूप में अवस्थित इस विद्यालय की स्थापना महान स्वतंत्रता सेनानी तथा त्याग की प्रतिमूर्ति पं० काशीनाथ पाण्डेय जी की प्रेरणा के फलस्वरूप आर.एस.एस. के प्रचारक जीवन व्यतीत करने के उपरान्त श्री प्रेम नारायण लाल द्वारा सन् 1965 में गुरु पूर्णिमा के दिन कालीमहल मुहल्ले में किराये के भवन में शिक्षा के प्रति अपनी रुचि को मूर्तरूप प्रदान करते हुए भारतीय शिक्षा मन्दिर के नाम से एक विद्यालय की नींव रखी गयी और ग्यारह बच्चों को लेकर पठन-पाठन कार्य का शुभारम्भ किया गया तथा यह ध्यान रखा गया कि बालकों में शिक्षा के साथ-साथ शिष्टाचार, सदाचार, सामाजिकता, राष्ट्रभक्ति एवं परस्पर सहयोग की वृत्ति जागृत हो।

संस्थापक प्रधानाचार्य के रूप में स्व० प्रेमजी ने विद्यालय के विकास की गति को निरन्तर जारी रखते हुए और अपने अन्तर्निहित गुण तथा सामाजिक सहयोग से सन् 1965 में ही विद्यालय को प्राइमरी की मान्यता दिला दी। प्रारम्भिक अध्यापकों ने घर-घर जाकर अभिभावक सम्पर्क का मानों अभियान चला दिया। विद्यालय में ही अध्यापकों के भोजन आदि की व्यवस्था सामुहिक रूप से थी। सम्पर्क में प्रधानाचार्य जी तथा श्री होरी लाल जी, श्री केदारनाथ ओझा, श्री राम नरेश सेठ, श्री जयशंकर पाण्डेय, श्री दुर्गा प्रसाद, श्री जवाहर मिस्र आदि ने समय दिया। प्रारम....

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सूचना/न्यूज

  • उत्तर प्रदेश बोर्ड कक्षा १० का परीक्षा दिनांक २४अप्रैल से प्रारम्भ हो रहा है l
  • उत्तर प्रदेश बोर्ड कक्षा १२ का परीक्षा दिनांक २४ अप्रेल से प्रारम्भ हो रहा है l
  • प्रवेश पत्र हेतु विद्यार्थी विद्यालय कार्यालय में सम्पर्क करें l

निदेशक संदेश

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श्री विनय कुमार पाण्डेय

इस प्रगतिशील युग में नित नवीन तकनीक के उपयोग के बिना प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। माध्यमिक शिक्षा परिषद् द्वारा भी इसी पथ का अनुसरण करते हुए प्रथम बार अपने पारम्परिक परिवेश से बाहर निकल कर नवीन तकनीकी को अपनाते हुए शैक्षिक सत्र 2013-2014 से अग्रिम पंजीकरण की समस्त कार्यवाहियों को इस नवसृजित वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन कराया गया, जो कि शतप्रतिशत सफल रहा था। इससे परिषदीय कार्यों की गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता में आशातीत वृद्धि हुई। इस सफलता के लिये हम प्रदेश के समस्त शिक्षाधिकारियों एवं समस्त संस्थाओं के प्रधानाचार्यो आदि का विशेष आभार व्यक्त करते है।.

संयुक्त निदेशक संदेश

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डा० प्रदीप कुमार

इस प्रगतिशील युग में नित नवीन तकनीक के उपयोग के बिना प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। माध्यमिक शिक्षा परिषद् द्वारा भी इसी पथ का अनुसरण करते हुए प्रथम बार अपने पारम्परिक परिवेश से बाहर निकल कर नवीन तकनीकी को अपनाते हुए शैक्षिक सत्र 2013-2014 से अग्रिम पंजीकरण की समस्त कार्यवाहियों को इस नवसृजित वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन कराया गया, जो कि शतप्रतिशत सफल रहा था। इससे परिषदीय कार्यों की गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता में आशातीत वृद्धि हुई। इस सफलता के लिये हम प्रदेश के समस्त शिक्षाधिकारियों एवं समस्त संस्थाओं के प्रधानाचार्यो आदि का विशेष आभार व्यक्त करते है।.

डी आइ ओ एस संदेश

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डा० विनोद कुमार राय

इस प्रगतिशील युग में नित नवीन तकनीक के उपयोग के बिना प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। माध्यमिक शिक्षा परिषद् द्वारा भी इसी पथ का अनुसरण करते हुए प्रथम बार अपने पारम्परिक परिवेश से बाहर निकल कर नवीन तकनीकी को अपनाते हुए शैक्षिक सत्र 2013-2014 से अग्रिम पंजीकरण की समस्त कार्यवाहियों को इस नवसृजित वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन कराया गया, जो कि शतप्रतिशत सफल रहा था। इससे परिषदीय कार्यों की गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता में आशातीत वृद्धि हुई। इस सफलता के लिये हम प्रदेश के समस्त शिक्षाधिकारियों एवं समस्त संस्थाओं के प्रधानाचार्यो आदि का विशेष आभार व्यक्त करते है।.

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प्रधानाचार्य संदेश

भारतीय जनमानस में शिक्षालय की तुलना देवालय से की गयी है क्योंकि दोनों में साधना प्रमुख है देवालय में जहां तप की साधना करके मनुष्य अपने नश्वर कामनाओं से मुक्त परमात्मा का सामिप्य प्राप्त करता है। उसी तरह देवालय में छात्र तप करके अपने अन्तर दोषों को गुरु से ज्ञान प्राप्त कर परिमार्जित करता है शायद इसीलिए गुरु को ‘आचार्य देवो भव' की उपमा प्रदान की गयी है। छात्र जब विद्यालय में प्रवेश लेता है बहुत सारी अज्ञानता, उत्सुकता उसके अन्तर्मन में निवास करती है। ऐसी स्थिति में एक आदर्श गुरू उसके अन्तर्मन के विकारों को अपने कठिन प्रयासों से दूर करके सद्गुणों का आरोपण से करते हुए छात्र के सद्ज्ञान की उत्सुकता को अपने ज्ञान से है तथा छात्र को पूर्ण मनुष्य के रूप में परिमार्जित करता है। कभी-कभी छात्र-गुरू एवं ज्ञान के बीच कुलगत संस्कार ..

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अध्यापक/ अध्यापिका

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प्रिय विद्यार्थी

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